भगवान!आप के वास्तविक स्वरूप को जानने वाला पुरुष आपके दिए हुए पुण्य और पाप कर्मों के फल सुख एवं दुखों को नहीं जानता, नहीं भोगता; वह भोग्य और भोक्ता पन के भाव से ऊपर उठ जाता है। उस समय विधि-निषेध के प्रतिपादक शास्त्र भी उस से निवृत हो जाते हैं; क्योंकि वह देहा भिमानियो के लिए है। उनकी ओर तो उसका ध्यान ही नहीं जाता। 1परमार्थ निरूपण 2भागवत धर्म 3यदुकुल संहार 4स्वधामगमन 5कलियुगी राजा 6धर्म 7नाम संकीर्तन 8प्रलय
गुरुवार, 31 मार्च 2022
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
Index
परमार्थ निरूपण बद्रिकाश्रम गमन यदुकुल संघार स्वधाम गमन वंश राजवंश धर्म नाम संकीर्तन प्रलय
-
भगवान! आप के वास्तविक स्वरूप को जानने वाला पुरुष आपके दिए हुए पुण्य और पाप कर्मों के फल सुख एवं दुखों को नहीं जानता, नहीं भोगता; वह भोग्य औ...
-
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! यद्यपि व्यवहारमें पुरुष और प्रकृति—द्रष्टा और दृश्यके भेदसे दो प्रकारका जगत् जान पड़ता है, तथापि परमार्थ-द...
-
श्री कृष्ण का अंतिम उपदेश/आदेश गच्छोद्धव मयाऽऽदिष्टो बदर्याख्यं ममाश्रमम् । तत्र मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शनैः शुचिः ।।४१ ईक्षयालकनन्...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें