- भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! यद्यपि व्यवहारमें पुरुष और प्रकृति—द्रष्टा और दृश्यके भेदसे दो प्रकारका जगत् जान पड़ता है, तथापि परमार्थ-दृष्टिसे देखनेपर यह सब एक अधिष्ठान-स्वरूप ही है; इसलिये किसीके शान्त, घोर और मूढ़ स्वभाव तथा उनके अनुसार कर्मोंकी न स्तुति करनी चाहिये और न निन्दा। सर्वदा अद्वैत-दृष्टि रखनी चाहिये ।।१।।
- भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि उद्धव जी यद्यपि व्यवहार में पुरुष और प्रकृति दृष्टा और दृष्टि की वेज से दो प्रकार का जगत जान पड़ता है तथा भी परमार्थ दृष्टि से देखने पर यह सब एक अधिष्ठान शुरू की है इसलिए किसी के शांत, घोर और और मूढ़ स्वभाव तथा उसके अनुसार कर्मों की ना स्तुति करनी चाहिए और न निंदा। सर्वदा अद्वैत दृष्टि रखनी चाहिए।
- जो पुरुष दूसरों के स्वभाव और उनके कर्मों की प्रशंसा अथवा निंदा करते हैं वह शीघ्र ही अपने यथार्थ परमार्थ साधन से च्युत हो जाते हैं क्योंकि साधन तो द्वैत के अभिनिवेश का-- उसके प्रति सत्यत्व- बुद्धि का निषेध करता है और प्रशंसा तथा निंदा उसकी सत्यता के भ्रम को और भी दृढ़ करती है।
भगवान!आप के वास्तविक स्वरूप को जानने वाला पुरुष आपके दिए हुए पुण्य और पाप कर्मों के फल सुख एवं दुखों को नहीं जानता, नहीं भोगता; वह भोग्य और भोक्ता पन के भाव से ऊपर उठ जाता है। उस समय विधि-निषेध के प्रतिपादक शास्त्र भी उस से निवृत हो जाते हैं; क्योंकि वह देहा भिमानियो के लिए है। उनकी ओर तो उसका ध्यान ही नहीं जाता। 1परमार्थ निरूपण 2भागवत धर्म 3यदुकुल संहार 4स्वधामगमन 5कलियुगी राजा 6धर्म 7नाम संकीर्तन 8प्रलय
गुरुवार, 31 मार्च 2022
1 परमार्थ निरूपण,11/28
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परमार्थ निरूपण बद्रिकाश्रम गमन यदुकुल संघार स्वधाम गमन वंश राजवंश धर्म नाम संकीर्तन प्रलय
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श्री कृष्ण का अंतिम उपदेश/आदेश गच्छोद्धव मयाऽऽदिष्टो बदर्याख्यं ममाश्रमम् । तत्र मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शनैः शुचिः ।।४१ ईक्षयालकनन्...
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